क्या आज भी हमारी संगीत गायको की परंपरा जीवित है क्या आपने कभी सोचा है शास्त्री संगीत व चित्रपट संगीत मैं अंतर क्यों माना जाता है तो आइए देखते हैं
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| 👉https://youtu.be/Beh1hgQ7kLY |
आज़ादी के 72 साल: जब सत्ता यह तय करती है कि जनता क्या सुन सकती है, क्या गा सकती है, तब संगीत और संगीतकारों को अपना रास्ता बदलना पड़ता है या ख़त्म हो जाना पड़ता है.
.1_शास्त्रीय संगीत की ख़्याल गायकी के शाम चौरासी घराने के नाम के पीछे एक दिलचस्प कहानी है. पिछली सदी के शुरुआती वर्षों में अविभाजित पंजाब के एक गायक को उसके आश्रयदाता राजा ने इनाम के तौर पर चौरासी गांवों के महसूल (राजस्व) से नवाज़ा था.
.2_इस वाकये के बाद शाम नाम का वह गायक- ‘शाम चौरासी’ नाम से पुकारा जाने लगा और उसकी शैली में गाने वाले, जिसमें उसके परिवार वाले और शागिर्द भी थे (जिनमें हिंदू और मुस्लिम दोनों थे) शाम चौरासी घराने के सदस्य कहलाने लगे
.3_ये 84 गांव जिस इलाके में हैं, वह आज भारत में पड़ता है. 1947 में इस संगीत परंपरा के ज़्यादातर अनुयायी नक्शे पर खींची गई लकीर को पार करके उस ज़मीन पर बस गए, जिसे आज पाकिस्तान कहा जाता है.
.4_दिल्ली घराना शैली की नुमाइंदगी करने वालों के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. इनमें से कई पाकिस्तान चल गए, तो कुछ ने भारत में ही रहने का फैसला किया.
.5_घरानों के नाम अक्सर किसी जगह के नाम पर रखे जाते हैं. अपने संस्थापक के नाम पर किसी घराने के नामकरण की मिसालें न के बराबर हैं (शाम चौरासी संभवतः इस मायने में भी ख़ास है कि इसमें संस्थापक और जगह, दोनों का नाम जुड़ा हुआ है)
.https
://youtu.be/kowARsNeMqo
.6_कोई गायक किसी नई और बन रही शैली को मुकम्मल रूप देने वाले के तौर पर याद किया जा सकता है. अन्य गायकों को घराने की गायकी या गायन शैली और इसके खजाने में नए तत्व जोड़ने या पहले से मौजूद तत्वों को नए सिरे से संवारने का श्रेय दिया जा सकता है. लेकिन, किसी शैली का नामकरण उसके जन्म की जगह के आधार पर ही करने का लगभग एक रिवाज सा रहा है.
.7_यह भी दिलचस्प है कि किसी घराने का जगह से बना नाम सालों-साल कायम रहता है. उस सूरत में भी, जब किसी घराने के अनुयायी दूसरे इलाके में चले जाते हैं, या अलग-अलग इलाकों में बिखर जाते हैं.
.8_इसलिए, भारत में आज हम पाते हैं कि कोई घराना अपने जन्म की जगह से उखड़ कर किसी दूसरी जगह पर फल-फूल रहा है. यह सिलसिला कोई आज शुरू नहीं हुआ है. इसकी शुरुआत काफी पहले, 1857 में शाही संरक्षण की परंपरा के ध्वस्त होने के साथ मानी जाती है.
.9मिसाल के तौर पर अगर जयपुर घराने को लें, तो बड़ी संख्या में इस शैली के गायक आज मुंबई, पुणे, कोल्हापुर, और महाराष्ट्र के दूसरे स्थानों में फैले हुए हैं.
.3_ये 84 गांव जिस इलाके में हैं, वह आज भारत में पड़ता है. 1947 में इस संगीत परंपरा के ज़्यादातर अनुयायी नक्शे पर खींची गई लकीर को पार करके उस ज़मीन पर बस गए, जिसे आज पाकिस्तान कहा जाता है.
.4_दिल्ली घराना शैली की नुमाइंदगी करने वालों के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ. इनमें से कई पाकिस्तान चल गए, तो कुछ ने भारत में ही रहने का फैसला किया.
.5_घरानों के नाम अक्सर किसी जगह के नाम पर रखे जाते हैं. अपने संस्थापक के नाम पर किसी घराने के नामकरण की मिसालें न के बराबर हैं (शाम चौरासी संभवतः इस मायने में भी ख़ास है कि इसमें संस्थापक और जगह, दोनों का नाम जुड़ा हुआ है)
.https
://youtu.be/kowARsNeMqo
.6_कोई गायक किसी नई और बन रही शैली को मुकम्मल रूप देने वाले के तौर पर याद किया जा सकता है. अन्य गायकों को घराने की गायकी या गायन शैली और इसके खजाने में नए तत्व जोड़ने या पहले से मौजूद तत्वों को नए सिरे से संवारने का श्रेय दिया जा सकता है. लेकिन, किसी शैली का नामकरण उसके जन्म की जगह के आधार पर ही करने का लगभग एक रिवाज सा रहा है.
.7_यह भी दिलचस्प है कि किसी घराने का जगह से बना नाम सालों-साल कायम रहता है. उस सूरत में भी, जब किसी घराने के अनुयायी दूसरे इलाके में चले जाते हैं, या अलग-अलग इलाकों में बिखर जाते हैं.
.8_इसलिए, भारत में आज हम पाते हैं कि कोई घराना अपने जन्म की जगह से उखड़ कर किसी दूसरी जगह पर फल-फूल रहा है. यह सिलसिला कोई आज शुरू नहीं हुआ है. इसकी शुरुआत काफी पहले, 1857 में शाही संरक्षण की परंपरा के ध्वस्त होने के साथ मानी जाती है.
.9मिसाल के तौर पर अगर जयपुर घराने को लें, तो बड़ी संख्या में इस शैली के गायक आज मुंबई, पुणे, कोल्हापुर, और महाराष्ट्र के दूसरे स्थानों में फैले हुए हैं.
इसी तरह से आज धारवाड़ में किराना घराना के गायक बड़ी तादाद में पाए जाते हैं. नक्शे पर देखें, तो किराना (जिसका उच्चारण कभी-कभी कैराना के तौर पर भी किया जाता है) उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा कस्बा है.
यहां यह उल्लेखनीय है कि जगह बदलने के साथ स्थानीय संगीत और भाषाई विशेषताओं के प्रभाव से (घराने की) गायकी की शैली भी कई मायनों में बदलती है.
शाम चौरासी और दिल्ली जैसे घरानों के मामले में जगह और शैली में बदलाव कुछ और भी इशारा करता है. वर्तमान समय में, बात महज़ इतनी नहीं है कि घराना गायक अपनी ज़मीन से दूर आ गए हैं.


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